Wednesday, February 5, 2020

Everybody loves Jagannath Puri 4

Everybody loves Jagannath Puri 4
शाम छह बज़े हम कोणार्क मंदिर से चंद्रभागा समुन्द्र तट की और चल दिया थे। कुछ ही कदम चलने के बाद एक बुरी तरह से लदी, एक छोटी बस गुज़री थी जिसके पीछे हम लटककर समुन्द्र तक पहुंच गए थे। सूर्य एक विशाल आग का सिंधुरी गोला बनकर पानी में डूबने ही वाला था। आसमान ऊपर से गहरा काला और फिर सूर्य की दिशा में कुछ नीचे गहरा नीला और अंत में गुलाबी था। ऊपर का काला आसमान धीरे धीरे नीचे समुन्द्र के तरफ सरक रहा था। कुल तीन या चार मिनटों में सूर्य डूब गया था और चन्द्रहीन आकाश पूरा घुप्प काला हो चूका था। इन्ही चंद मिनटों में सुनहरी आकाश, सितारों भरे काले आसमान में बदल गया था।

पुरी का समुन्द्र क्योकि पूर्व दिशा में है इसलिए सूर्योदय का जबरदस्त नज़ारा है। सर्दियों के सूर्यास्त का नज़ारा भी ज़बरदस्त है मगर यह नज़ारा दक्षिण दिशा में होता है। सूर्य करीब समुन्द्र और धरती के मिलन के स्थान पर डूबता नज़र आता है। गोवा में ठीक उल्टा है क्योकि समुन्द्र पूर्व में है।

पुरी का मंदिर beach से करीब 32 किलोमीटर है। हम एक खाली ऑटो पर बैठकर वापिस आ गए थे। चंद्रभागा से पुरी का रास्ता इतना खूबसूरत है कि अँधेरी रात को वापिस जाने में मुझे कुछ खोया खोया सा महसूस हो रहा था। मैं इस रास्ते पर बारम बार आना चाहता हूँ। रास्ता, महानदी डेल्टा सिस्टम की दो नदियां भी पार करता है, दोनों नदियां सामने ही समुन्द्र में मिलती नज़र आती हैं। एक धारा पर सड़क पर ही रामचंडी का मंदिर है। यह स्थान अति सुंदर है।
तीन दिनों से हम पुरी में थे मगर हम अभी तक मंदिर में ठाकुर जी से नहीं मिले थे। मंदिर जिस सड़क पर है उसे ग्रैंड रोड कहते हैं। या यूँ कहा जा सकता है कि यह सड़क नहीं है अपितु तीन किलोमीटर लम्बा एक प्लाजा है। यहाँ पर मेले जैसी स्थिति रहती है। सभी मुसाफिर पहले यहीं पर या तो अपने वाहनों से उतारते हैं या स्टेशन, हवाई अड्डे इत्यादि से पहले पहले सीधे यहाँ पर ही आते हैं। बस अड्डा भी इसी प्लाजा का हिस्सा है जो मंदिर से दो किलोमीटर इस सड़क या प्लाजा के मध्य में है। असल में दूसरे छोर पर भी एक विख्यात मंदिर अखाड़ा शुक्ला दशमी है जहाँ पर पुरी की प्रख्यात रथ यात्रा समाप्त होती है। यह रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन होती है जिसमे लाखों लोग हिस्सा लेते हैं।
मंदिर में प्रवेश करने वालों की तादाद नाममात्र की ही थी। गोचीलाल एक स्टाल पर अपने जूते जमा करवा आया था, मगर मैंने जिंदगी में कभी अपने जूते किसी स्टाल इत्यादी पर जमा नहीं करवाए। सदा की तरह, मैंने एक जूता सड़क पर एक स्थान पर उतार दिया था और दूसरा जूता अपने पावं से ही दूर झटक दिया था; अब कोई एक जूता तो उठाकर भागने वाला नहीं, आजतक नहीं भगा। कश्मीर से कन्याकुमारी तक।
मेरा जूता पचास फुट दूर जाकर गिरा था। गोचीलाल चिल्लाया था, “एक न एक दिन तुम्हारा जूता किसी के सर पर जा टकराएगा।”
“अभी पक्का निशाना नहीं हुआ मेरा।”
“पिछली बार तुम्हारा जूता नाले में जा गिरा था।”
“इतना तो रिस्क लेना ही पड़ता है।”
“पप्पू बताता था, कलकत्ता में हावड़ा पुल से पहले, सिख संगत गुरद्वारे के बाहर तुम्हारा एक जूता गायब मिला था।”
“गायब नहीं हुआ था, तीसरे दिन मिल गया था। कलकत्ते की भीड़ में कुछ दो सो फुट दूर सरक गया था।”
“तुम तीन दिन तक इसी काम में लगे रहे थे ?”
“नहीं, मैं तो तीन घंटे ढूंढने के बाद पीछा छोड़ गया था मगर तीसरे दिन हम रात को जब वापिसी के लिए हावड़ा स्टेशन जा रहे थे तो मुझे मिल गया गया था। रात के ग्यारह बजे तब सड़क पर भीड़ नहीं थी।”
“तुमने गले लगा लिया होगा। चूमा चाटा होगा।”
“वो तो होता ही है।”
गोचीलाल ने आँखे तरेरते हुए कहा था, “होता क्यों न हो। जब घिसते दम तक कोई तुम्हारा हमसफर हो।”
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मंदिर में हमने एक नल से हाथ मुँह धोये थे।
गोचीलाल बड़बड़ाया था, “ठाकुर से कुछ काकाजी के बारे में बात कर लेना ?”
“ओके बॉस।”
“मैं भी करूंगा, तुम भी नहीं भूलना।”
“यस सर।”
ठाकुर ने नीले कपड़े पहन रखे थे। तीनों ठाकुर सचमुच में बहुत खूबसूरत लग रहे थे। आरती होने लगी थी, इस समय चंद ही लोग थे।
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मंदिर के बाहर एक जूता तो मुझे सलामत मिल गया था और दूसरा वाले से एक कुत्ता नाश्ता करने का प्रयास करता मिला था।

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To be continued .....

Everybody loves Jagannath Puri 3

Everybody loves Jagannath Puri 3

रतिभाई के साथ मोटरसाइकिल पर उसके गांव जाने से पहले उसने अपने मछलीपालन के तालाब से, एक जाली द्वारा कुछ बड़ी मछलियां पकड़ीं थीं। मछलियां जिन्दा और ताज़ी रहें इसलिए उन्हें एक पानी भरी थैली में डाला था, क्योंकि मैं मोटरसाइकिल पर सबसे पीछे बैठा था इसलिए यह थैली मेरे कंधे पर लटकी थी। थैली में मछलियां बेचैनी से संघर्षमय थीं और ऊपर से कच्ची सड़क के झटकों से पानी उछल उछल कर मुझपर छलक रहा था।

बंगाल और उड़ीसा में मछली बहुत खाई जाती है। तिलाफिआ (Tilapia) मछली पालन इन दोनों प्रांतों में बहुत कामयाब है। एक यही मछली है जो शाकाहारी है इसलिए इसकी फीड सस्ते में मिलती है। कुदरती वातावरण में यह मछली पानी में उगने वाले पौधे और घास खाती है। उष्ण इलाकों में यह मछली बहुत फलती है। ऑस्ट्रेलिया इत्यादि गर्म देशों में इस मछली को नदियों और तालाबों से काई और जलीय खर पतवार ख़त्म करने के पानी में छोड़ा गया था मगर अब इस मछली की अधिकता अब सरदर्द बन चुकी है। यह मछली सर्दी नहीं बर्दाश्त कर सकती इसलिए उत्तरी भारत में नहीं पाई जाती। 17 C डिग्री तापमान से नीचे यह नहीं बचती। हिलसा मछली के विलुप्त होने के कारण अब उड़ीसा और बंगाल में अधिकतर Tilapia मछ्ली ही खाई जाती है।

रतिभाई का गांव कोणार्क जाने वाली एक अधकच्ची सड़क पर था। वो गांव का पूर्व सरपंच रहा था और गांव के मंदिर की कमिटी का प्रधान भी था। अब कहीं कहीं ट्यूबवेलों से धान की खेती होती नज़र आ रही थी और कुछ मछली पालन के तालाब भी थे। कहीं कहीं इक्का दुक्का नारियल और ताड़ के पेड़ थे जो अत्यधिक ताड़ी और नेरी निकालने की वज़ह से बहुत कमज़ोर से थे।

शाम के तीन बज़ चले थे। हमने दोपहर का खाना नहीं खाया था, रतिभाई हमें ताज़ी बनी मछली खिलाना चाहता था मगर मैं और गोचीलाल शाकाहारी हैं, इसलिए उन्होंने हमारे लिए दाल-भात बनना रख दिया था। जब तक भोजन तैयार होता, रतिभाई हमें गांव के मंदिर में ले आया था। उड़ीसा के सभी मंदिरों की तरह इस मंदिर के बाहर भी दो शेर बने थे। मुझे अक्सर उड़ीसा के मंदिरों के इन शेरों की शक्ल देखकर हंसी ही आया करती है। एक इंग्लिश प्रख्यात फिल्म है Wizard of the oz, इस फिल्म में एक शेर होता है जो शक्ल से तो भोंदू और डरपोक होता ही है मगर असल में भी बहुत डरपोक होता है। ज़रा सी ही आहट पर वो डरकर ज़ोर ज़ोर से रोने लगता है और अपनी पूँछ के सिरे को पकड़कर अपने आंसू पोंछा करता है।

बरगदों, पीपल और इमली के घने पेड़ों के बीच इस खुले आँगन का मंदिर मुझे बहुत मनोरम लगा था। बीसों पंछी चहचहा रहे थे। एक पीपल के पेड़ के नीचे केवड़े की अगरबत्ती जल रही थी, ऐसे वातावरण में और खुशबु में मेरा मन वहीं रम गया था। मैं इस वातावरण में ही कुछ पल गुज़ारना चाहता था, गोचीलाल रतिभाई के साथ ताड़ी खरीदने के लिए कहीं चल दिया था।
शाम पांच बज़े हमें रतिभाई कोणार्क के मंदिर तक छोड़ने आया था। गोचीलाल दोबारा सूर्य मंदिर जाने का इच्छुक था मगर मुझे एतराज़ था की जब हमने दो दिन पहले यह देख ही लिया है तो फिर से टिकट खरीदने का क्या फायदा। अब सभी खर्चे मेरी जेब पर ही तो पड़ने होते हैं। असल में जब हम इस मंदिर में आये थे तभी हमें चंद्रभागा beach नज़र आई थी और पूरा रास्ता हमें बहुत मनोरम लगा था इसीलिए आज आज सुबह हम चंद्रभागा आये थे।

रतिलाल के पास मेरी इस समस्या का समाधान था, वो हमें मंदिर के पीछे ले गया था वहां पर दिवार में से कुछ गायब ईंटों के कारण ऊंचाई कम थी। हम दोनों उसकी मदद से बेटिकट ही प्रांगण में कूद गए थे ।

जनवरी के महीने का सूर्य चंद्रभागा की दिशा शाम के पांच बजे ही ढलने लगा था। आसमान गुलाबी हो गया था और वातावरण में पंछियों का शोर था। हम मंदिर की ड्योढ़ी पर सूर्य की दिशा में पालथी मार कर बैठ गए थे।


गोचीलाल ने बात छेड़ी थी, “मैंने रतिभाई से वायदा किया है की मैं उसे फ्रांस ले जाऊंगा।”
मेरी हँसी निकल गयी थी जो अगले कुछ मिनटों तक बेक़ाबू चलती रही थी।
गोचीलाल चीखा था, “इसमें हसने के क्या बात है। रतिभाई ने मुझे अपने प्रोग्राम के लिए गांव का मंदिर उपलब्ध करवाने की पेशकश की है। वो बीस लोगों के रुकने का इंतज़ाम भी करेगा। बदले में मुझे भी उसके लिए कुछ करना होगा। करना होगा कि नहीं?”
“बंधु गोचीलाल, तुम्हें खुद को छह बार कनाडा का वीसा नहीं मिला और चार बार अमेरिका का और तीन बार ऑस्ट्रेलिया का वीसा मना क्या जा चूका है। वो तो हमारी किस्मत अच्छी थी कि मेरी तिकड़म काम कर गयी तो तुम्हें फ्रांस की एम्बसी से यूरोप का वीसा मिल गया।”
“जब मुझे मिल सकता है तो रतिभाई को भी मिल सकता है। उसपर भी वोही तिकड़म लगायेंगे जो मुझपर लगाई थी।”
मेरा मन किया था अपने दोनों हाथों से अपना सर पीट लूँ।

गोवा में Emile के फ्रांस लोट जाने के पश्चात मेरी स्कीम थी कि इस हुतात्मा गोचीलाल को वीसा अफसर के पास एक स्पेशलिस्ट डॉक्टर बना कर पेश किया जाये। मैंने कारवाड़ में गोचीलाल पर एक महीना रिहर्सल करवाने पर खर्च किया था। मैं हर रोज़ गोचीलाल से माथा-कूट करता रहा था मगर गोचीलाल की अक्ल टस न मस रही थी। उसका बहाना यह था की उसका दिल कारवाड़ में नहीं है, गोवा छोड़ने के बाद उसका दिल टूट गया है। हमें गोवा से भागना पड़ा था इसकी कुछ वज़ह थीं। एक तो लिव ने मेरे सर पर एक और नारियल के तेल की बोतल फोड़ दी थी; इस बार बोतल कांच की थी। वो असल में उसने प्लास्टिक की लीक होती बोतल का तेल कांच की बोतल में भर डाला था जिसे उसने अगले दिन ही मेरे सर पर फोड़ डाला था। क्योकि मैं अपने सर की उससे मालिश करवाने के बाद उसके सर की मालिश करने से मुकर गया था। गोचीलाल को मेरे सर पर पांच टांके लगाने पड़े थे।

दूसरी वज़ह यह थी कि सुबह मैं लिव से खिसकने की फिराक में अपने होटल की पहली मंज़िल से, जिस प्लंबिंग के पाइप से नीचे उतरता था। उसी दिन वो पाइप भी टूट गया था। दरअसल कुछ जेम्स बांड की फिल्म जैसी घटना हुई थी कि मैं उस पाइप पर अभी लटका ही था की वो ईमारत से अलग हो गया था और मैं पाइप पकडे हवा में था। फिर मैं गली में नीचे चाय की दुकान की खपरैल की छत पर लैंड कर गया था। छत भी फुट गयी थी। मैं और गोचीलाल पांच मिनटों में ही अपना सामान लपेटकर अपने होटल से रफ्फूचक्कर हो गए थे। लिव भी आननफानन में अपना सामान लपेटकर हमारे पीछे भागी थी मगर हम दोनों चलती हुई बस पर लटक कर उसे गच्चा दे गए थे।

महीना भर गोचीलाल से असफल सर-खपाई के बाद मैंने नई स्कीम बनाई थी। हम भटिंडा वापिस आ गए थे। Emile के बुलावे के कागज़ आ गए थे मगर उन कागज़ों में कुछ दम नहीं था। Emile एक होटल में वेटर थी और उसके बैंक में नाम मात्र की ही पूंजी थी। दिल्ली में वीसा की इंटरव्यू के दिन मैं गोचीलाल को एक ब्यूटी पार्लर पर ले गया था जहाँ पर उसके सर पर शेव करके गंजा किया गया था और उसका चेहरा किसी फिल्म में किसी विलेन की तरह चमकाया गया था। मैंने उसे यूरोप की सबसे महंगे ब्रांड Armani की एक नई कमीज़ पहनाई थी। उसपर एक बहुत महंगा कोलोन स्प्रे किया था। एक नकली रोलेक्स घडी, काले महंगे नज़र आने वाले बूट, एक नकली सोने के अंगूठी। उसदिन मैं दो हज़ार रुपयों के नीचे आ गया था।

फ्रांस की एम्बेसी में महिला वीसा अफसर ने गोचीलाल से कुछ पूछा था मगर गोचीलाल ने जवाब की जगह नकली विजिटिंग कार्ड आगे कर दिया था। डॉ. गोचीलाल, MBBS, MD - Internal Medicine, DM - Nephrology ........ वीसा अफसर ने कुछ और पूछा था तो जवाब में गोचीलाल ने अपने बहुत महंगा नज़र आने वाला ब्रीफ़केस खोला था जिसमे ऊपर ऊपर स्टेथोस्कोप रखा था और और कुछ दवाइयां इत्यादि। गोचीलाल ब्रीफ़केस से उटपटांग कागज़ों की एक फाइल निकाली थी। अभी गोचीलाल ने वो फाइल वीसा अफसर के आगे की ही थी कि वीसा अफसर ने उसे एक टोकन दे दिया था की अगले दिन वो अपना पासपोर्ट और वीसा ले जा सकता है।

कोणार्क मंदिर में मैं गोचीलाल पर चीखा था, “अब तुम उम्मीद करते हो कि रतिभाई को भी गंजा करेंगे और इसपर केवड़ा छिड़केंगे और इसे भी एम्बेसी में परेड करवाकर वीसा दिलवा देंगे ?”
गोचीलाल मुस्कराते हुआ बोला था, “अज़ी नहीं, अब तो मैं टेलिपाथी से वीसा अफसर के दिमाग में डाल दूंगा कि रतिभाई को वीसा देना ही देना है।”
“मैं तो समझा था कि जब से तुम फ्रांस में नक़ली गुरु बने हो तभी से तुम रूहानी ब्रॉडकास्ट कैच करने लगे हो। अब तुम दावा करते हो की तुम ब्रॉडकास्ट केवल कैच ही नहीं करते बल्कि टेलीकास्ट भी कर सकते हो।”
गोचीलाल चिल्लाया था, “मैं नकली गुरु नहीं हूँ। पचासों लोग मुझे मानते हैं, कुछ तो है मुझ में।”

To be continued .....

Everybody loves Jagannath Puri 2

Everybody loves Jagannath Puri 2

चंद्रभागा beach सड़क के किनारे पर पड़े कबाड़ से मैंने एक एक लीटर की दो पानी की साफ खाली बोतलें ढूंढ कर पानी से भर कर अपने बैकपैक में रख लीं थीं। मेरे पास एक टेड़ा मेडा एलुमिनियम का बर्तन और चाय की पत्ती भी थी।

पर मछुओं के गांव के आधा किलोमीटर के बाद ही बियावान था। आदमी के होने के सभी लक्षण समाप्त हो गए थे। एक तरफ गरज़ता हुआ समुन्द्र था और दूसरी तरफ काजू, केवड़े और Casuarina का घना जंगल था। Casuarina के पेड़ ऑस्ट्रेलिया से लेकर लगाए गए हैं जो भारत के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं। असल में ऑस्ट्रेलिया की जलवायु तक़रीबन भारत जैसी ही है। अगर कर्क रेखा भारत के मध्य से गुज़रती है तो मकर रेखा ऑस्ट्रेलिया के मध्य से गुज़रती है। भारत में मिलने वाले बहुत से पेड़ ऑस्ट्रेलिया से लेकर लगाए गए हैं और यह पेड़ अब भारत के ही नागिक हो चुके हैं। जैसे सफेदा, Casuarina, Australian Acacia, Australian teek इत्यादि।

Casuarina पेड़ की खासियत यह है की यह रेतीली नमक वाली धरती पर भी फल सकता है और सख्त गर्मी बर्दाश्त कर सकता है। समुन्द्र के किनारे पर खेती इसी पेड़ की वज़ह से फलित हूँ सकती है क्योकि पेड़ हवा में से नमक चूस लेते है।

जैसे जैसे हम गांव से दूर होते जा रहे थे वैसे ही कछुओं की तादाद बढ़ रही थी। कछुए beech की रेत पर स्वछंद घूम रहे थे। सर्दियों के दिन थे इसलिए गर्मी तो ज्यादा नहीं थी मगर धुप की चमक बहुत तीखी थी। मैंने समुन्द्र में नहाने का इरादा कर लिया था। गोचीलाल को सदा ही समुन्द्र से डर लगता है इसलिए मैं अकेले ही नहाया था। मैं नहाता भी रहा था और साथ साथ पानी में चलते चलते और आगे बढ़ता रहा था।

हम गांव से कम से कम तीन किलोमीटर दूर आ गए थे। गोचीलाल की बैचनी बढ़ती चली जा रही थी। गोचीलाल को बहुत से खतरे महसूस होने लगे थे कि कोई बड़ी मछली रेत में आकर उसपर लपककर उसे पेल न दे या पानी में न घसीट ले जाये। जंगल से कोई जानवर उसपर हमला न करदे।

इससे पहले फ़ोन का सिग्नल ख़त्म हो जाये, मैंने काकाजी जी को अमेरिका में फ़ोन किया था। वहां पर रात के साढ़े ग्यारह बजे थे। बात ख़त्म होने के बाद मैंने एक लम्बी आह भरी थी।

मैंने गोचीलाल से कहा था, “ब्रदर गोचीलाल, काकाजी और ओलिविया की शादी होने में 85 रह गए।”

“ठाकुर जी भली करे। यानि कि शादी होकर रहेगी।”

“तीन दिन के बाद काकाजी को चर्च से कैथोलिक बनने का सर्टिफिकेट मिलेगा। छह महीनों से वो मन लगाकर ईसाई धर्म के बारे में सीख रहा है।”

“ओह।”

“मुझे ताना दे रहा था कि मैंने उसका दिमाग धोने का पूरा प्रयास किया था मगर फिर भी उसकी किस्मत में ओलिविया जैसी मजबूत इरादे की पतित और पाक दामन वाली और मजबूत इरादे वाली पत्नी नसीब हो रही है।”

समुन्द्र में नहाते नहाते हुए करीब एक किलोमीटर चलने बाद मैंने पानी से बाहर आकर, एक लीटर की बोतल से अपने शरीर से नमक धोया था। अगर पानी किफ़ायत से इस्तेमाल किया जाये तो एक या आधे लीटर पानी से कोई खुद को को बहुत आसानी से धो सकता है। मैं तो नहाते हुए एक किलोमीटर चला था मगर गोचीलाल को धुप अब सताने लगी थी। हम beech से सटे काजू और कज़रीना के जंगल में गए थे। जंगल का कोई छोर नज़र नहीं आ रहा था मगर हमें एक सूखे तालाब के किनारे पर बरगद का पेड़ नज़र आया था। पेड़ के नीचे हमने सूखे पत्तों से आसानी से आग जलाकर पानी उबालना रख दिया था। साथ में लेमन ग्रास भी उगी हुई थी जिसके कुछ पत्ते हमने पानी में डाल दिए थे।

गोचीलाल बोला था, “कल पलटू की दादी बता रही थी, ठाकुरों (भगवन जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा) ने बैंगनी पोशाक पहनी हुई थी। तीनों बहुत सुंदर नज़र आ रहे थे।”

“पर सुबह तो मंदिर में जाने वालों की लम्बी कतार थी और तुम्हें गर्मी ज्यादा लग रही थी।”

“आज शाम को हम मंदिर में जाकर ठाकुर से काकाजी की जान बचने के लिए विनती करेंगे।”

“अब यही चारा है।”

गोचीलाल ने एक लम्बी आह भरी थी। “अब ठाकुर जी ही काकाजी को बचा सकते हैं।”

धुप जरूर चमकदार थी मगर हवा बहुत मोहक और आरामदायक थी। सामने जंगल से चमकते हुए समुन्द्र की झलक और आवाज़ आ रही थी। कई किस्मों के पंछी चहचहा रहे थे। मैं भी अब तक पूरा सुख चूका था। ऐसे वातावरण में बिना मीठे और दूध की चाय अत्यंत स्वादिष्ट लगी थी।

गूगल अर्थ से जो मैंने नक्शा प्रिंट किया था उसके अनुसार जंगल में तीन किलोमीटर चलने के बाद हमें कोणार्क से काकतपुर जाने वाली गांव की सड़क मिलने की संभावना थी। नक्शे में कुछ तालाब भी थे। मैंने गोचीलाल से इस रास्ते से चलने को पूछा था मगर वो अब सुनसान beech के साथ साथ वापिस जाने से घबरा रहा था। वो जंगल में भी जाने से घबरा रहा थे मगर जब मैं चल दिया था तो वो मेरे पीछे पीछे अपने पांव घसीटने लगा था। जंगल में हर तरफ पगडंडियां जा रहीं थीं मगर यह आदमी की बनाईं हैं या जानवरों के द्वारा यह जानना मुश्किल था। असल में यह पूरा इलाका महानदी के डेल्टा का हिस्सा था, सभी लक्षण ऐसे थे कि अक्सर बाढ़ आने पर यह इलाका पानी में डूब जाया करता होगा। धरती में नमक की मात्रा नज़र आ रही थी। जंगल केजुरीना, काजू और केवड़े के पेड़ों से बना था। अन्य झाड़ियां या घास इत्यादि नाम मात्र की हीं थीं। यही वज़ह थी की यह स्थान आदमी के रहने जीने या खेती करने के लिए उपयुक्त नहीं था इसलिए इसे कुदरत के हवाले कर दिया गया।

करीब एक किलोमीटर के ऊबड़खाबड़ के बाद हमें एक मछलीपालन का तालाब नज़र आया था। अब सूखा मौसम होने की वज़ह से तालाब में दलदल ही थी। अब इस इलाके में आदमी के होने के लक्षण नज़र आने लगे थे।

गोचीलाल मेरे पीछे पीछे भुनभुनाते हुए पांव पटखता हुआ चल रहा था। जंगल अब विरल हो चला था। समुन्द्र बहुत पीछे रह गया था। दूर एक बिजली का खम्बा नज़र आ रहा था। नज़दीक पहुंचें पर वहां पर एक ट्यूबवेल और तालाब था जो पानी से भरा था जिसमे बहुत सी तिलापिया मछलियां थीं। हम दोनों तालाब में नहाने के लिए उत्तर गए थे।

अभी हम नहा ही रहे थे कि एक आदमी मोटरसाइकिल पर आया था और हमें उसके तालाब में नहाते हुए पाकर बुरा भला कहने लगा था। जब उसे मालूम हुआ की मैं अमेरिका में रहता हूँ और गोचीलाल फ्रांस में तो वो शांत हो गया था। वो खुद अमेरिका जाने का बहुत इच्छुक था अब वो अपने गांव में हमें अपने घर ले जाना चाहता था। उसका नाम रतिलाल था।

अब हम तीनों मोटरसाइकिल पर थे।

To be continued .....

Sunday, February 2, 2020

Everybody loves Jagannath Puri 1

Everybody loves Jagannath Puri 1

मैं और गोचीलाल चंद्रभागा beach पर उत्तर दिशा की और पैदल चल दिए थे। हमारे दाहिने तरफ समुन्द्र था और बाएं तरफ केवड़े और काजू के पेड़ों का जंगल था। जनवरी के महीने में किसी किसी केवड़े के पेड़ पर फूल खिले थे। गहरा नीला आसमान, हमारे क़दमों तले चीनी जैसी सफ़ेद रेत, एक तरफ से समुन्द्र का शोर और जंगल की तरफ से केवड़े की भीनी भीनी खुशबु हमें स्वर्ग जैसी अनुभूति दे रही थी। गांव से मछलियां पकड़ने की नावें समुन्द्र में गयीं थी। उनको एक बजे के करीब वापिस आना था, हम उनकी मछलियां देखना चाहते थे। अभी सुबह के नौ ही बजे थे। हमारे पास चार घंटों का समय था।

सुबह आठ बजे हमने पूरी से चंद्रभागा के लिए ऑटो लिया था। जब रास्ते में गांव में हम नाश्ता करने के लिए रुके थे तो एक सज्जन ने हमें अपने ऑटो में बैठने की विनती की थी; वो जंगल महकमे में एक अफसर थे। उन्हें अपने साथ बैठना हमारे लिया बहुत जानकारी भरा सिद्ध हुआ था। उन्होंने केवड़े के बारे में बहुत जानकारी दी थी। केवड़ा बहुत से देशों में उगता है मगर केवल उड़ीसा के केवड़े में ही इतनी खुशबु होती है कि इसका सेंट बनाया जा सके। या यूँ कहा जाये कि केवड़े का जितना भी सेंट बनाया जाता है वो कम से कम 95% उड़ीसा में बनता है। यह पेड़ समुन्द्र के किनारे पर और दूर भी पाया जाता है मगर तीव्र खुशबु केवल समुन्द्र के किनारे पर ही होती है। ठीक ऐसा ही काजू के पेड़ के साथ है। काजू केवल समुन्द्र के किनारे पर नमक वाली हवा में ही फलता है। पश्चिमी तट पर काजू भारत में गोवा और केरल में पाया जाता है और पूर्वी तट पर केवल उड़ीसा में। केवड़े का पेड़ 18 फुट तक ऊँचा होता है और यह बरगद के पेड़ की तरह जड़ों से उठते तनो के सहारे इतना घाना जंगल बनाता है कि इस जंगल के अंदर तक जाना मुश्किल होता है। इसके पत्ते भी कंटीले होते हैं। केवड़े के नर और मादा पेड़ अलग अलग होते हैं। खूबसूरत और खुशबु वाले फूल केवल नर पेड़ पर ही खिलते हैं, मादा पेड़ के फूल पत्तों जैसे ही साधारण होते हैं जो फल बनते हैं।

केवड़े के फूल साल में तीन बार खिलते हैं। गर्मियों, मॉनसून और सर्दियों में। सेंट बनाने के लायक अति सुगन्धित फूल मॉनसून में खिलते हैं जुलाई से सितम्बर तक। करीब 60% फूल; करीब 30% फूल गर्मियों में खिलते हैं और 10% फूल सर्दियों में।

जैसा मैंने Google Earth पर देखा था की यह विशाल अनछुई और शाश्वत beech सत्रह किलोमीटर तक चलती है फिर एक नदी आती है जिसे शायद पैदल पार नहीं किया जा सकता। उसके बाद फिर सत्रह किलोमीटर लम्बी खूबसूरत beech, फिर इतनी ही दुरी के बाद अगली नदी और फिर यह सिलसिला कुछ और किलोमीटर तक है। फिर पारादीप बंदरगाह पर यह सिलसिला समाप्त हो जाता है, उसके बाद पूरा तट एक विशाल दलदल है, कही कही पर छोटा सी beach हो तो हो मगर बांग्लादेश, सुंदरबन और बर्मा तक हज़ारों किलोमीटर तक अधिकतर दलदल ही दलदल है।

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शाम को पुरी में हमारे कमरे के मालिक के बेटे और हमारे मित्र पलटू के भाई की शादी की रिसेप्शन अपने चर्म पर थी। पलटू का परिवार और समाज विशुद्ध शाकाहारी था; चंद पीने वाले अपने अपने कोनों में अपनी निजता और एकांत में अपनी बोतल खोले हुए थे।

मैं और गोचीलाल भी एक कोने में अपनी बोतल खोले हुए थे।

अचानक DJ पर पुराने मुहोब्बत भरे गीत बजने शुरू हो गए थे। पहला पहला गाना सुनते ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। मेरी रीढ़ की हड्डी में ठंडी लहर कोंध गयी थी और मेरे माथे पर ठंडा पसीना प्रकट हो गया था। मैंने अपने हाथों से कान बंद कर लिए थे।

गोचीलाल ने चिल्लाकर मुझसे पूछा था, “कहीं तुम्हें हार्ट अटैक तो नहीं हो गया ?”

“मैं ठीक हूँ, बस यह गाना मुझे माफिक नहीं आता।”

“इस गाने ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है।”

“मेरी दुःख भरी याद जुडी है इससे।”

“मालूम तो हो कौन से दुःख वाली याद। इतना मीठा गीत है यह।”

“कोई एक दुःख हो तो बताऊँ। जिंदगी ने जिंदगी भर गम दिये हैं।”

“फिर भी। पता तो चले ? तुम भी तो मेरी जिंदगी के सभी राज़ों को जानने के लिए उतावले रहते हो।”

“बस अब मैं दुःख भरी कोई भी बात नहीं छेड़ना चाहता।”

“शायद इस गाने से तुम्हें संध्या शर्मा की याद आ जाती है ?”

मैं चीखा था, “नहीं। बंद करो अपनी बकवास।”

“अगर तुम बताओगे नहीं तो मैं खुद ही अंदाज़े लगाऊंगा या नहीं ?”

मायूस होकर मुझे उगलना ही पड़ा था, “इस गाने का सम्बन्ध -- मैंने जिंदगी में पहली बार भूत देखा था। जब मैं वहां से जान बचाकर दौड़ रहा था तो कहीं से मुझे यह गाना सुनाई दिया था।”

“तुमने मुझे पहले कभी नहीं बताया। तुम खुद तो कहते रहते हो कि भुत प्रेत तो मन का वहम होते हैं।”

“वो मैं इसलिए कहता हूँ कि तुम नाहक ही ना डरते रहा फिरो।”

गोचीलाल के मुँह पर कुटिल मुस्कान थी। “अच्छा! अच्छा! मैं नाहक ही न डरता रहूं ?”

“हाँ और नहीं तो क्या।”

अगला गाना शुरू होते ही मैंने गोचीलाल का धयान इस बात से हटाने के लिए उसके गिलास में मोटा पेग लगाकर उसके आगे रख दिया था।

मगर उसका ध्यान इस बात से हटने की बजाय और भी अधिक चिपक गया था।

वो मुस्कराते हुआ बोला था, “तुमने उस भूत से तुमने मल्ल युद्ध भी किया होगा ?”

“गोचीलाल पहली बात कि वो आदमी का भूत नहीं था वो औरत का भूत था। जो मैंने देखा था। और दूसरी बात; यह भूत प्रेत मल्ल युद्ध नहीं किया करते। यह केवल डराया और सताया ही करते हैं।”

गोचीलाल की कुटिल मुस्कान और गहरी हो गयी थी। अब उसका सर भी हिलने लगा था। “केवल डराया सताया ही करते हैं … हूँह … यानि कोई खतरनाक भूतनी देखी थी तुमने।”

“यस सर।”

“तो उसने तुम्हें केवल डराया सताया ही था।”

“हाँ गोचीलाल, अब भूत तो ऐसे काम करते ही हैं। तुम्हें कभी सामने नज़र आते हैं और फिर कभी अचानक तुम्हारे पीछे से आ जाते हैं। बेवजह भागदौड़ करते हैं और बेवज़ह ही भागाधापियाँ करवाते भी हैं।”

“अच्छा अच्छा। यह गीत तुम्हें संध्या शर्मा की याद दिलाता है।”

मैं तिलमिलाकर चीखा था, “नहीं, मैं सचमुच के भूत की बात कर रहा हूँ। तुम संध्या शर्मा को बीच में ना लाया करो।”

गोचीलाल गुनगुनाने लगा था, “संध्या शर्मा। संध्या शर्मा। डाक्टरनी।”

To be continued .....

Saturday, June 22, 2013

La Paz (Mexico)

We catch a huge ferry from Los Mochis (Mexico) to La Paz at 9 am. Ship gracefully moves in the peaceful water of the enclosed Gulf of California. Water is still, blue and once a while you can see a large fish, as this gulf is shark infested so we see sharks too. Sea gulls are flying along the ship because it stirs up the water in the back and brings small fishes up and bird dive in the water like a missile. Before diving, seagull becomes like a torpedo and dives as deep as 20 feet and always returns with a fish in its beak.
Baja California Desert
Baja California Desert

Saturday, June 8, 2013

Ultimate Road Trip – The scenic Overseas Highway to Key West, Florida USA

The Florida Keys are coral islands in southeast United States. They begin at the southeastern tip of the Florida peninsula, about 15 miles (24 km) south of Miami, and extend in a gentle arc south-southwest and then westward to Key West. At the nearest point, the southern tip of Key West is just 90 miles (140 km) from Cuba.
Visit to Florida Keys is a spectacular hundred miles drive and road crosses several islands over the spectacular bridges. Alongside the Overseas Highway, there are hundreds of places where you can pull over to fish or kayak or enjoy a pina colada. Camping in the Keys is a special treat, and there are dozens of magnificent coral reefs where you can snorkel or dive. Fresh-caught seafood is a Keys staple, offered at a broad range of Keys restaurants.
We leave Everglades early in the morning and return to the Florida town of Homestead and catch on the US route 1.

Sunset in the Keys

The Strip at Las Vegas

The Strip is what Las Vegas is known for. No matter where you are on the strip it is sensory overload. The crowds, shows, musicians, Elvis imitations, hotels, and attractions pretty much ensure there isn’t a dull moment. There is always something on the grandest scale going on.
North end you have the Stratosphere, where we stayed and regretted. It is a grand hotel so why regret? Each time we had to walk miles from the parking and then within the corridors to get to our room.

Las Vegas

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